वो भी क्या दिन थे
जब लालच खिलौनों से ज़्यादा
एक अठन्नी की होती थी
जब उस एक अठन्नी से
सारे बाजार की सैर मज़े से होती थी

वो भी क्या दिन थे
जब माँ से ज़्यादा
पड़ोस की चाची
के लड्डू अच्छे लगते थे
जब पापा की डॉंट से बचाने
दादाजी बहाने बना दिया करते थे

वो भी क्या दिन थे
जब बेतुकी मस्तियों से भी दिलचस्प
नानी की कहानियां लगती थीं
जब कैंडी क्रश से ज़्यादा
अक्कड़ बक्कड़ की लत थी

वो भी क्या दिन थे
जब दोस्ती नाम से नहीं
शरारती मुस्कानों से होती थी
जब मटमैले पायजामों में
एक साथ झील में गोतें लगती थीं

वो भी क्या दिन थे
जब यूँ ही बिना वजह
छोटी को चिढ़ाया करते थे
जब बरसात की बौछार में
उसे भिगोया करते थे

वो भी क्या दिन थे
जब पराये अपनों से प्यारे थे
अपने वक़्त के मारे न थे
जब खुशियों की दस्तक के लिए
दिल पलों पहर तरसते न थे

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आशा सेठ