क्या बताएं तुम्हें
उस रात की बात
चौखट पे बैठे
अतीत की चादर में लिपटे
किस कदर हम
ख्वाहिशों को तरसे

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क्या बताएं तुम्हें
उस रात की बात
होठों को सीए
खामोशियों की बाहों में सिमटे
किस कदर हम
अल्फ़ाज़ को तरसे

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क्या बताएं तुम्हे
उस रात की बात
खुद से गुफ्तगू करते करते
जाने कब
तन्हाईयाँ हमें अकेला
मेहफ़ूज़ छोड़ गयीं
ज़िन्दगी इस कदर
भी हसीं हो सकती है
यह बात हमें समझा गयीं

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आशा सेठ