बसेरा…

चुपके से दबे पाओं आकर मेरे घर में तुम्हारी बातें कुछ ऐसे बसेरा कर गयीं की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो झलकती उन आइनों से जिनमें मैं कभी खुदको तलाशता था की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो छलकती इन पलकों से जिनसे मैं कभी खुदको तराशता था ~~~~~ आशा सेठ

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