घर

दीवारों की दरारों में छुपी ज़र्द यादें पास जाकर देखा कभी मेरा बचपन सतह पर तैरता कभी दादी का बुढ़ापा कनखियों से झाँकता खिड़कियों के पार से सन्नाटे ताकते कभी होली में रंगे माँ-बाबा की झलक तो कभी बिदाई में सजी अन्नू का अक्स खाली कमरों में गूंजते हँसी के पटाखे कभी पापा के ठहाके... Continue Reading →

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सुनहरी यादें…

सूरज की लौटती किरणों के संग हताश तन्हाईयाँ वापस लौट गयीं सुनहरी यादों से लिपटी यह शाम एक बार फिर हमें ज़िंदादिल कर गयी... ~~~~~ आशा सेठ

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