कल…

चलते चलते कदम नहीं थकते ठहर जाने से थकते हैं यह सोचकर परेशान नहीं दिल की कल की सुबह आज सी नहीं होगी पर इस सोच में डूबा रेहता है की आज की शाम कल सी हुई तोह क्या डर इस बात का नहीं की कल अपने मुँह मोड़ लें फिक्र इस बात की होती... Continue Reading →

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बसेरा…

चुपके से दबे पाओं आकर मेरे घर में तुम्हारी बातें कुछ ऐसे बसेरा कर गयीं की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो झलकती उन आइनों से जिनमें मैं कभी खुदको तलाशता था की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो छलकती इन पलकों से जिनसे मैं कभी खुदको तराशता था ~~~~~ आशा सेठ

सुनहरी यादें…

सूरज की लौटती किरणों के संग हताश तन्हाईयाँ वापस लौट गयीं सुनहरी यादों से लिपटी यह शाम एक बार फिर हमें ज़िंदादिल कर गयी... ~~~~~ आशा सेठ

उस रोज़…

उस रोज़ जब नींद ने अलविदा कहा ऐसा लगा बरसों पुराने किसी दोस्त से बिछड़ना हुआ खुद को जब आईने में देखा ऐसा लगा किसी अजनबी से मुलाकात हुई हस्ते हुए चेहरे के पीछे उस अक्स को पहचान न सकी आंगन में कबूतरों की गुटर गु कुछ नागवार सी लगी उनकी आवाज़ उदासीन सी लगी... Continue Reading →

एक सफरनामा ऐसा भी …

एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ भीगी बारिशें तो हैं पर नमी में लिपटी मुरझाई यादें भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ मुलाकातें तो हैं पर होटों पे सिमटी ज़र्द ख्वाहिशें भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ हर वक़्त हलचल तो हैं पर पल पल पे जमी ख़ामोशी की झिल्लियां भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ... Continue Reading →

उस रात की बात …

क्या बताएं तुम्हें उस रात की बात चौखट पे बैठे अतीत की चादर में लिपटे किस कदर हम ख्वाहिशों को तरसे ~~~ क्या बताएं तुम्हें उस रात की बात होठों को सीए खामोशियों की बाहों में सिमटे किस कदर हम अल्फ़ाज़ को तरसे ~~~ क्या बताएं तुम्हे उस रात की बात खुद से गुफ्तगू करते... Continue Reading →

आज भी…

यादों की जीर्ण दीवारों पर आज भी तस्वीर तेरी लगी है कुछ चंद लम्हों को संजोती आज भी निगाहों में नमी हैं रात की बेसब्र खामोशियों में आज भी सदाएं तेरी गूंजती हैं कुछ चंद लम्हों को संजोती आज भी निगाहों में नमी हैं मौसम के रंगीन चेहरों पर आज भी अक्स तेरी सजी है कुछ... Continue Reading →

एक शाम वक़्त के नाम…

कई सुबह कई शामें गुजरीं वक़्त के कदम कभी न रुके एक पल में सदियाँ बदल गयीं कई सदियाँ एक पल में सिमटे ~~~ इस पहेली में गुम यह सोचा ज़रा फुर्सत से बैठें वक़्त को मुट्ठी में थाम उससे दो बातें करें हमने कहा: "आओ, ज़रा बैठो कुछ किस्से हमें भी सुनाओ अनकहे अनसुने... Continue Reading →

वो भी क्या दिन थे …

वो भी क्या दिन थे जब लालच खिलौनों से ज़्यादा एक अठन्नी की होती थी जब उस एक अठन्नी से सारे बाजार की सैर मज़े से होती थी वो भी क्या दिन थे जब माँ से ज़्यादा पड़ोस की चाची के लड्डू अच्छे लगते थे जब पापा की डॉंट से बचाने दादाजी बहाने बना दिया... Continue Reading →

जिस दिन उसने …

तड़पती तरसती उन निगाहों ने मुस्कुराना छोड़ दिया जिस दिन उसने अपना घर, अपना देश अपना आँगन छोड़ दिया ठहरती फिसलती उन क़दमों ने खुशियां ढूँढना छोड़ दिया जिस दिन उसने अपना घर, अपना देश अपना आँगन छोड़ दिया रोती सिसकती उन आँखों ने सपने देखना छोड़ दिया जिस दिन उसने अपना घर, अपना देश... Continue Reading →

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